कर्म ------------- लेखनी कविता -08-Jun-2024
" दैनिक प्रतियोगीता हेतु "
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दिनांक :- 8 = 6 = 2024
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दिन :- शनिवार
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विषय :- स्वैच्छिक
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-------------" कर्म "-------------
कर्म ही है पूजा , कर्म ही है साधना ,
कर्म बिन जहां में, कुछ नहीं मिलना ।
कर्म से ही, अर्थ-उपार्जन होता है ,
तब इन्सान सुख की नींद सोता है ।
आलस्य से तो नुकसान ही होता है ,
आलसी जन निंदा के पात्र बनता है ।
आमदनी के लिए कर्म करना पड़ता है ,
आमदनी बिना भूखा रहना पड़ता है ।
इस लिए कर्म करना बहुत ही जरूरी है ,
कर्म तप है , तपस्या है न कि मजबूरी है ।
कहावत भी है कर्म का फल मीठा होता है ,
कर्मशील व्यक्ति ही ये फल चख सकता है ।
- गोविन्द रीझवाणी "आनंद "_✍️
- सुरत ( गुजरात )
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